शहीद भगत सिंह की जीवनी | About Bhagat Singh in Hindi

about bhagat singh in hindi

भगत सिंह एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके लाखों फेन हैं, वो हर भारतीय के दिल की धड़कन् है। दा लीजेंड ऑफ भगत सिंह केवल एक नाम ही नहीं है ब्रांड है। जब हम भारत के स्वतंत्रता सेनानी के बारे में बात करते हैं, तो पहला नाम दिमाग में आता है वो है भगत सिंह। जो महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आज़ाद और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथी क्रांतिकारी थे। उन्हें शाहिद-ए-आज़म भी कहा जाता है।

भगत सिंह हर भारतीय के हीरो हैं, जो 90 साल बाद भी देशभक्त युवाओं के अंदर एक शोले की तरह जल रहे हैं
भगत सिंह को स्लोगन लिखने की आदत थी। भगत सिंह के स्लोगन बहुत प्रेरित और मोटीवेट करने वाले है।

भगत सिंह का प्रारंभिक जीवन

28 सितंबर 1907 भारतीय इतिहास का महान दिन, जिस दिन महान व्यक्ति का जन्म हुआ। जन्म स्थान पंजाब (पंजाब) के लायलपुर जिले में बंगा गाँव है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्या देवी कौर था। जिस दिन भगत सिंह का जन्म हुआ था, उसी दिन उनके पिता और दो चाचा राजकुमार (जेल) से रिहा हुए। शहीद भगत सिंह किसान परिवार से हैं। उनके परिवार में राजनीतिक गतिविधि चलती रहती थी। उनके चाचा और पिता ग़दर पार्टी के सदस्य थे।

जब 13 अप्रैल 1919 जलियांवाला बाग नरसंहार (ह्त्या कांड) अमृतसर में हुआ, उस वक्त भगत सिंह केवल 12 वर्ष का था। इतनी छोटी आयु में उन्होने जलियांवाला स्थल का दौरा किया। अमृतसर या जलियावाला कांड भगत सिंह के विचारों पर बड़ा प्रभाव डालते हैं। बचपन के दिनों में ही भगत ने ब्रिटिश सरकार को उखाड़ने का सपना देखना शुरू कर दिया था।

1921 में महात्मा गांधी ने अहिंसा सत्यग्रह शुरू किया। भगत सिंह इन आंदोलन में भाग लेते हैं। लेकिन 4 फरवरी 1922 को पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं। पुलिस द्वारा हवाई फायरिंग के कारण अहिंसावादी प्रदर्शनकारी नाराज हो गए। लोगों ने पुलिस स्टेशन पर गोलीबारी की। इन घटनाओं में 20 पुलिसकर्मी और 3 नागरिक मारे गए। गांधी लोगों का समर्थन नहीं करते हैं और अहिंसा के आंदोलन को रोकने का फैसला करते हैं। शहीद भगत सिंह गांधी की इस इच्छा से खुश नहीं थे।
भगत सिंह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि, हिंसा ही स्वतंत्र होने का केवल एक तरीका था। उसके बाद वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी (एचआरए) पार्टी के सदस्य बने। जिसे चंद्रशेखर आज़ाद ने बनाया है। सरदार भगत सिंह एचआरए का नाम बदलते हैं और नया नाम देते हैं, हिंदुस्तान सोशल रिपब्लिकन आर्मी (एचएसआरए)। पार्टी का उद्देश्य समाजवादी भारत बनाना था।

क्रांतिकारी गतिविधियां

Bhagat Singh Biography / about bhagat singh in hindi

लाला जी की मौत का बदला

1928 में साइमन कमीशन भारत में आया। इसके खिलाफ़ लोग आंदोलन कर रहे थे। लाला जी जो कि एक राजनीतिज्ञ थे इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। ब्रिटिश पुलिस ने अचानक से लाठी चार्ज कर दिया , जिसमें लाला जी घायल हो गए। 17 अस्पताल मे रहने के बाद वह चल बस्से। भगत सिंह और एचएसआरए के सदस्य बहुत गुस्सा आया। उन्होंने पुलिस एसपी स्कोट को मारने का फैसला किया, जो लाला जी की मौत के लिए जिम्मेदार था।

योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर के कोतवाली थाने के सामने पहुँचते हैं। वे इधर-उधर घूमने लगते है। जयगोपाल साइकिल की चैन लगाने लग जाता है। एसपी स्कॉट के आने पर जयगोपाल भगत सिंह को संकेत देने के लिए तैयार थे।

शाम 4 बजे के करीब एएसपी सांडर्स आता है। भगत सिंह और राजगुरु को लगता है कि वह स्कॉट हैं, वो गोली चलाते है और सांडर्स को मार डालते है। वे लाला जी की मौत का बदला ले लेते हैं।

1929 एसम्ब्ली बम धमाका

8 अप्रैल 1929 को लगभग 12:30 बजे केंद्रीय एसेंबली में एक बैठक जारी होती है। जिसे असेंबली के अध्यक्ष (विट्ठलभाई पटेल) द्वारा चलाया जाता है। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त विधानसभा जाते है। वे असेंबली मे बीच में बम फेंकते हैं, जहां कि बहुत कम लोग थे। उनका उद्देश्य किसी को मारना नहीं था। बम फेंकने का उद्देश्य बहेरे अंग्रजो तक आवाज पहुचांना था।

बम फेंके जाने के बाद, असेम्बली में चारों तरफ धुआं भर गया। दो युवक “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे लगाने लगे। वो युवा और कोई नहीं भगत सिंह और बीके दत्त थे। दोनों ने खुद ही अपनी गिरफ्तारी दी।

विधानसभा की घटना का मास्टरमाइंड भगत सिंह था।
भगत सिंह वो पिस्तौल ले कर असेंबली जाते है, जिससे उन्होने साण्डर्स को मारा था। उन्हें पहले से ही पता था कि पिस्तौल सैंडर्स की हत्या का बड़ा सबूत था।

दोनों को अलग-अलग थाने ले जाया गया। चांदनी चौक थाने में बीटी दत्त और कोतवाली थाने में भगत सिंह। ताकि दोनों से अलग अलग पुछताछ कि जा सके।

भगत सिंह की जेल जीवन

भगत सिंह ने दो साल जेल में बिताए। उस विशेष समय में उन्होंने खुद के क्रांतिकारी विचार और विचारों को व्यक्त करने के लिए लेख लिखा। अपने लेख में भगत सिंह ने पूंजीपतियों को समाज का दुश्मन बताया।

उन्होंने लिखा कि भले ही एक भारतीय, जो समाज का शोषण करता है, वह समाज और देश का दुश्मन है। आपने भगत सिंह के लेख “मैं नास्तिक क्यों हूँ?” के बारे में सुना ही होगा, वो उन्होने जेल में ही लिखा था। भगत सिंह और अन्य स्वतंत्रता सेनानी 7 दिनों की भूख हड़ताल पर चले गए। एक सेनानी और उनके दोस्त यतींद्रनाथ दास ने 65 दिन कि भूख हड़ताल में अपनी जान दे दी।

फांसी

7 अक्टूबर 1930 कोर्ट ने फैसला दिया जिसमें राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव को मौत की सजा सुनाई गई थी। सजा के बाद, लाहौर में धारा 144 को कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए लगाया गया। प्रिवी काउंसिल ने भगत सिंह के लिए माफी कि अपील की। लेकिन अपील रद्द कर दी गई।

फिर पंडित मदन मोहन मालवीय (कांग्रेस अध्यक्ष) ने भी माफी की अपील की। वह भी रद्द कर दी गई। भगत सिंह कोई माफी नहीं चाहते थे। ये सभी अपील भगत की इच्छा के विरुद्ध हो रही थी।

फांसी के समय से ठीक पहले भगत सिंह ने लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। ब्रिटिश पुलिस ने आकर पूछा, आपकी अंतिम इच्छा क्या थी। द लेजेंड भगत सिंह ने कहा कि जीवनी पेदल के लिए समय दें।

जब जेल के अधिकारी ने सूचित किया कि फांसी का समय आ गया। उन्होंने कहा कि पहले रुक जाओ, एक क्रन्तिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है। फिर कुछ समय के बाद, किताब को छत की ओर उछाल दिया और कहा “ठीक है अब चलो।”

फांसी के फंदे कि तरफ जाते हुए वो गा रहे थे-

“मेरा रंग दे बसंती चोला, मेरा रंग दे,माँ मेरा रंग दे, बसंती चोला मेरा रंग दे बसंती चोला”

भारतीय इतिहास का काला दिन, 23 मार्च 1931 को शाम 7:33 बजे भगत और उनके दो दोस्तों सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई।

फांसी के बाद, अंग्रेज किसी भी आंदोलन के डर से, शव को छोटे छोटे हिस्सों में काटकर बोरियों में भर लेते है। फिरोजपुर जाकर मिट्टी के तेल से जला देते है।

पास के गांव के का आग को देख कर पास आते हैं। अंग्रेज डर जाते है और शवों को सतलुज नदी में फेंक कर भाग जाते है। लोग शरीर के अंगों को इकट्ठा करते हैं और उनका विधिवत अंतिम संस्कार करते हैं।

द लीजेंड ऑफ भगत सिंह हमेशा के लिए अमर हो गए।

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